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Pakistan election 2024 की वजह से संसद में अल्पसंख्यक कम क्यों; ईशनिंदा, जबरन धर्मांतरण, धर्मस्थलों पर हमले क्यों?

Pakistan election 2024: पाकिस्तान में गुरुवार को आम चुनाव के लिए लोगों ने मतदान किया है। यहां का अल्पसंख्यक समुदाय अपनी आबादी के लिहाज से असंतुलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आरोप लगाता रहा है।

गुरुवार को पाकिस्तान में आम चुनाव हुए। लोगों ने अपने पांच साल का भविष्य तय करने के लिए मतदान किया है। हालांकि, पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था का एक काला सच यह है कि यहां के अल्पसंख्यक आजादी के सात दशक बाद भी मतपत्र के जरिए अपनी आवाज उठाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां की संसद और प्रांतीय विधानसभाओं दोनों में इस समाज का प्रतिनिधित्व न के बराबर है जबकि इस समाज के देशभर में 44 लाख से ज्यादा मतदाता हैं। 

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए राजनीतिक व्यवस्था है?

पाकिस्तान के संविधान के अनुसार, यहां की संसद के निचले सदन यानी नेशनल असेंबली में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए 10 सीटें आरक्षित हैं। संसद के ऊपरी सदन (सीनेट) में चार सीटें आरक्षित होती हैं। वहीं सभी प्रांतीय विधानसभाओं में कुल 24 सीटें आरक्षित हैं। इनमें सिंध में नौ सीटें, पंजाब में आठ, खैबर पख्तूनख्वा में चार और बलूचिस्तान में तीन सीटें सुरक्षित हैं। 

इसके अलावा सभी प्रांतों में स्थानीय सरकारी व्यवस्थाओं में सभी स्तरों पर अल्पसंख्यकों के लिए पांच फीसदी सीटें आरक्षित हैं। फिर भी अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी के लिहाज से यह व्यवस्था असंतुलित है।
शुरुआत से अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व कैसा रहा है?

1947 में पाकिस्तान आजाद हुआ और 1956 में इसका संविधान लागू हुआ। इससे पहले 1951 और 1956 के बीच पाकिस्तान में प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत हुए थे। इस अधिनियम का उपयोग एक अनंतिम संविधान के रूप में किया गया था। उसी समय धार्मिक अल्पसंख्यकों के राजनीतिक एकीकरण पर एक जोरदार बहस चल रही थी। पाकिस्तान के नेता उस समय यह बहस कर रहे थे कि क्या अल्पसंख्यकों को मुस्लिम उम्मीदवारों के साथ संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र के जरिए या एक अलग निर्वाचन क्षेत्र के जरिए चुनाव लड़ना चाहिए।

जमात-ए-इस्लामी सहित कई मजहबी दलों ने संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों का विरोध किया। उस समय अधिकांश धार्मिक अल्पसंख्यक पूर्वी-पाकिस्तान में रहते थे। उस वक्त अधिकतर लोगों ने समान नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र की मांग की।

उधर मजहबी दलों का विरोध जारी रहा। शुरू में यह निर्णय प्रांतों पर छोड़ दिया गया। अप्रैल 1958 में अंततः संयुक्त निर्वाचन मंडल के पक्ष में निर्णय लिया गया और यह पूरे पाकिस्तान में लागू हुआ। हालांकि, मुख्यधारा की राजनीति  में धार्मिक अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

इसके बाद जनरल अयूब खान द्वारा नियुक्त संविधान आयोग ने भी एक अलग निर्वाचन प्रणाली लागू करने का आह्वान किया। 1970 के चुनाव संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के तहत हुए थे।

जुल्फिकार सरकार ने कुछ ठोस उपाय किए 

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के कार्यकाल के दौरान 1973 में नया संविधान बना। इस व्यवस्था ने संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की प्रथा को जारी रखा। इसके अलावा धार्मिक अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा की राजनीति में बल देने के लिए के लिए संविधान के अनुच्छेद 106 के जरिए सभी प्रांतीय विधानसभाओं में अल्पसंख्यकों के लिए कुल सात सीटें आरक्षित की गईं। बाद में चौथे संशोधन के माध्यम से प्रांतीय सीटों की संख्या बढ़ाकर नौ कर दी गई। इसके अलावा नेशनल असेंबली में अल्पसंख्यकों के लिए अलग से छह आरक्षित सीटें प्रदान करने के लिए अनुच्छेद 51 में भी संशोधन किया गया। इस तरह से आजादी के 26 वर्षों में यह पहली बार था कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए कुछ ठोस उपाय किए गए।

मार्शल लॉ में उलटा गया अल्पसंख्यकों का मताधिकार 

अब पाकिस्तान में वह दौर आया जब मार्शल लॉ लागू हुआ। जियाउल हक ने 1978 में मुस्लिम और गैर-मुस्लिम मतदाताओं के लिए अलग-अलग मतदाता सूची बनाने के लिए चुनाव कानूनों में संशोधन कर दिया। जियाउल हक ने पहली बार आठवें संशोधन के जरिए अल्पसंख्यकों के लिए एक अलग निर्वाचन प्रणाली लागू की। इस दौरान संविधान के अनुच्छेद 51 में संशोधन किया गया और मौजूदा सामान्य सीटें 200 से बढ़ाकर 207 कर दी गईं। इस तरह से सभी 207 सीटों को ‘मुस्लिम सीटें’ घोषित कर दिया गया।

उधर आठवें संशोधन के जरिए नेशनल असेंबली में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित कुल सीटों को छह से बढ़ाकर 10 कर दिया गया। इसी तरह प्रांतीय विधानसभाओं में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों की कुल संख्या को नौ से बढ़ाकर 23 करने के लिए अनुच्छेद 106 में भी संशोधन किया गया। हालांकि, ये सभी सीटें पृथक निर्वाचन प्रणाली के जरिए भरी जानी थी। इस व्यवस्था के तहत, नेशनल असेंबली के एक सदस्य के लिए पूरे देश को निर्वाचन क्षेत्र बनाया गया था और प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों के लिए पूरे प्रांत को निर्वाचन क्षेत्र बनाया गया था।

दूसरे शब्दों में कहें तो गैर-मुसलमानों को मुसलमानों के साथ रहने के बावजूद समान मतदान अधिकार और निर्वाचन क्षेत्र साझा करने की अनुमति नहीं थी। उन्हें केवल गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट देकर मताधिकार का आंशिक अधिकार दिया गया। उदाहरण से समझें तो नेशनल असेंबली में हिंदुओं के पास चार सीटें थीं। इसके लिए पूरे पाकिस्तान में हिंदुओं की एक मतदाता सूची तैयार की गई थी और इन सीटों के लिए उम्मीदवारों को वोट के लिए पूरे पाकिस्तान में घूमना पड़ता था। पूरे पाकिस्तान में शीर्ष चार स्थान हासिल करने वाले उम्मीदवारों को नेशनल असेंबली के लिए निर्वाचित घोषित किया गया।

ऐसा करके जियाउल हक ने पाकिस्तानियों को मुस्लिम और गैर-मुस्लिम मतदाताओं में बांट दिया। मताधिकार को उलटने के फैसले से अल्पसंख्यकों पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। इसका असर यह हुआ कि अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया गया।

वर्षों तक जारी रही अलग निर्वाचन व्यवस्था

पृथक निर्वाचन प्रणाली 1985, 1988, 1990, 1993 और 1997 के चुनावों में लागू रही। इसी समय धार्मिक पाकिस्तान पर अल्पसंख्यकों के लिए चुनावी नीतियों को उदार बनाने का अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ा। 2002 में जनरल मुशर्रफ ने संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को बहाल कर दिया। उन्हें मुख्यधारा में जगह देने के लिए आरक्षित सीटों की अतिरिक्त व्यवस्था की गई। 2002 की व्यवस्था के तहत ये सीटें असेंबली में राजनीतिक दलों द्वारा जीती गई सामान्य सीटों की कुल संख्या के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए भरी जानी थीं। 

2012 में सरकार ने 18वें संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 59 में संशोधन किया। इस तरह से देश के इतिहास में पहली बार उच्च सदन यानी सीनेट में अल्पसंख्यकों के लिए चार सीटें बनाई गईं। हालांकि, अल्पसंख्यक समुदाय लंबे समय से अपनी आबादी के अनुपात में सभी विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। 1985 के बाद से अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का अनुपात भी गिर गया है।

2002 में नेशनल असेंबली की सामान्य सीटें 207 से बढ़ाकर 272 कर दी गईं, लेकिन अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या वही रही। 2018 में 25वें संवैधानिक संशोधन के बाद खैबर पख्तूनख्वा में केवल एक सीट बढ़ाई गई जिससे यहां सीटों की संख्या 23 से 24 हो गई।

अल्पसंख्यकों की कम हिस्सेदारी का असर क्या हुआ है?

वर्तमान में अल्पसंख्यकों को समान नागरिक के रूप में सामान्य सीटों पर चुनाव लड़ने का समान अधिकार है। हालांकि, अधिकांश सियासी दल उन्हें सामान्य सीटों पर टिकट देने से कतराते हैं। इसके अलावा आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। दरअसल, राजनीतिक दलों द्वारा नामांकन सामान्य सीटों की संख्या के आधार पर किया जाता है जिन्हें वे सुरक्षित किए हुए हैं। 

इससे अल्पसंख्यक समुदायों की आशंकाएं बढ़ जाती हैं क्योंकि इन सीटों पर अल्पसंख्यक उम्मीदवार किसी भी मतदाता के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेह नहीं होते हैं। पर्याप्त प्रतिनिधित्व की कमी के कारण अल्पसंख्यक समुदायों की समस्याएं भी बढ़ी हैं। इनके पास महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं है।

ईशनिंदा के आरोप, जबरन धर्मांतरण, पूजा स्थलों पर हमले, नौकरी कोटा के कार्यान्वयन में कमी, जनगणना में कम गिनती आदि ऐसे गंभीर मुद्दे हैं जिन पर ध्यान नहीं दिए गए हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि अल्पसंख्यक नेता महत्वपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से अलग रहते हैं।

अल्पसंख्यकों का राजनीतिक भविष्य क्या?

कई बार अल्पसंख्यकों के कम प्रतिनिधित्व के मुद्दे को हल करने के लिए मांग उठी है। समाज की मांग है कि अल्पसंख्यकों को सामान्य सीटों पर कम से कम पांच फीसदी प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था महिलाओं के लिए हाल ही में लागू हुई है।

सारांश (Summary)
हमने आपको इस आर्टिकल में Pakistan election 2024 उसके बारे में विस्तार से बताए है साथ ही आपको ऑनलाइन फॉर्म के बारे में या किसी भी प्रकार की जानकारी चाहिए तो आप हमें कमेंट करके पूछ सकते हैं। और यह आर्टिकल आपको पसंद आया है और मददगार लगा है तो इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को जरुर शेयर कर दें ताकि वह भी इस Pakistan election 2024 के बारे में जानकारी ले सके! 

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